0NRG की फील्ड से RIL के गैस निकालने के आरोप को आर्बिट्रेशन पैनल ने गलत बताया
May 1, 2019 • Sudesh Jain

आरोप को आर्बिट्रेशन नई दिल्ली। आर्बिट्रेशन पैनल ने कहा हैकि रिलायंस इंडस्ट्रीज और उसकी पार्टनर बीपी पीएलसी और निको रिसोर्सेज ने कथित गैस माइग्रेशन मामले में दोषी नहीं हैं। ट्राइब्यूनल ने इसमें सरकार की दलील खारिज कर दी। केंद्र ने रिलायंस और उसके पार्टनर्स पर केजी बेसिन में ओएनजीसी की फील्ड से गलत ढंग से गैस लेने का आरोप लगाया था। उसने इससे हुए फायदे की एवज में रिलायंस से 1.55 अरब डॉलर की रकम वापस मांगी थी। आर्बिट्रेशन पैनल में तीन आर्बिट्रेशन पैनल में तीन सदस्य थे। इनमें से दो ने रिलायंस के पक्ष में फैसला दिया, जबकि पैनल में सरकार के प्रतिनिधि और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जी एस सिंघवी ने फैसले से असहमति जताई। रिलायंस की तरफ से पैनल में ब्रिटिश हाई कोर्ट के पूर्व जज बर्नार्ड एडर मेंबर थे। पैनल के तीसरे सदस्य सिंगापुर के लॉरेंस बू थे। ट्राइब्यूनल ने कहा कि अगर ओएनजीसी की फील्ड से गैस माइग्रेट होकर रिलायंस और उसके पार्टनर्स के एरिया में आई हो तो उन्हें उसके प्रॉडक्शन का अधिकार था। उन्होंने गलत ढंग से फायदा नहीं लिया। आर्बिट्रेशन पैनल के फैसले की जानकारी इस मामले से वाकिफ सूत्रों ने दी।

ऑइल मिनिस्ट्री के लिए यह दो महीने में दूसरा कानूनी झटका है। इससे पहले 31 मई को दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार से बाड़मेर ब्लॉक में वेदांता का कॉन्ट्रैक्ट बढ़ाने को कहा था। अदालत ने कहा था कि ओरिजिनल कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक इसे बढ़ाया जाए। सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील की है।

सरकार आर्बिट्रेशन पैनल के फैसले को स्टडी कर रही है। सूत्रों ने बताया कि वह आगे चलकर इसे अदालत में चुनौती दे सकती है, लेकिन अभी इस बारे में उसने कोई फैसला नहीं लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि सिंघवी के फैसले का विरोध करने से सरकार को अदालत में अपील करने में इसके मदद मिलेगी। आर्बिट्रेशन पैनल के फैसले का मतलब है कि रिलायंस, बीपी और निको को सरकार को 1.55 अरब डॉलर का भुगतान नहीं करना होगा। इस बारे में ऑइल मिनिस्ट्री को भेजी गई ईमेल का खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं मिला थारिलायंस ने भी इकनॉमिक टाइम्स के सवालों 14243 14243 इकनॉमिक टाइम्स के सवालों के जवाब नहीं दिए। ट्राइब्यूनल का फैसला जस्टिस ए पी शाह समिति के उलट है, जिसे सरकार ने इस मामले की जांच के लिए बनाया था। शाह समिति ने 2016 में अपनी रिपोर्ट दी थी, जिसके आधार पर सरकार ने रिलायंस और उसके पार्टनर्स से 1.55 अरब डॉलर की रकम मांगी थी। उसके बाद रिलायंस ने इस मामले में आर्बिट्रेशन शुरू किया था। यह विवाद 2014 में शुरू हुआ था। यह विवाद 2014 में शुरू हुआ था। उस समय ओएनजीसी ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपने ब्लॉक से रिलायंस पर गैस प्रॉडक्शन का आरोप लगाया था। दोनों कंपनियों ने इसके बाद अमेरिकी कंसल्टेंट डीएंडएम को नियुक्त किया था