पुनर्वास नीति के बिना एनटीपीसी के लिए जमीन अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू
April 24, 2019 • Sudesh Jain

पुसौर के लारा में निर्माणाधीन एनटीपीसी के लिए बोड़ा झरिया व छपोरा में छूटे हुए जमीन का पूरक भू अधिग्रहण किया जा रहा है। दोनों गांवों में भू अर्जन कार्रवाई के तहत धारा 19 का प्रकाशन कर अब अवार्ड पारित करने की तैयारी है। जिला प्रशासन अवैधानिक तरीके से किसानों की जमीन लेने पर तुला हुआ है। बगैर पुनर्वास नीति का प्रकाशन किए धारा 19 का प्रकाशन कर दिया गया। जबकि भू राजस्व संहिता अधिनियम 2013 के नियमानुसार पहले पुनर्वास नीति का प्रकाशन होता है फिर धारा 19 का, लेकिन एनटीपीसी कंपनी प्रभावित किसानों को पुनर्वास नीति के तहत नौकरी नहीं देना चाहता। इसलिए जिला प्रशासन कंपनी की कठपुतली बनकर नियम विरुद्ध किसानों की जमीन लेने में लगा है। इसमें किसानों को केवल जमीन के मुआवजा का निर्धारण किया जाएगा, लेकिन पुनर्वास का निर्धारण नहीं किया जाएगा यानी उन्हें जमीन की कीमत तो मिलेगा, लेकिन प्रभावित परिवार के एक सदस्य को उसकी योग्यतानुसार रोजगार देने का जो नियम है उससे वंचित किया जा रहा है। भू-अर्जन अधिकारी द्वारा किसानों के लिए अवैध रूप से एवार्ड पारित कर उन्हें उनके विधिक अधिकार से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है। छपोरा में 13.299 तो बोड़ा झरिया में 4.167 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण करने के लिए धारा 19 का प्रकाशन हो चुका है। शेष देवलपुरा, कांदागढ़, आरमुड़ा में भी छूटे हुए किसानों की जमीन अधिग्रहण की जाएगी। एनटीपीसी के रोडतो हाद जाएगी। न पहले की न ही अब जिला पुनर्वास समिति का गठन किसी भी प्रयोजन के लिए जमीन अधिग्रहण के पूर्व जिला पुनर्वास नीति समिति का गठन किया जाता है, लेकिन एनटीपीसी लारा प्रोजेक्ट के लिए न तो पहले कभी जिला पुनर्वास नीति समिति का गठन किया गया न ही अब पूरक अधिग्रहण के लिए। इस समिति में पुनर्वास नीति का अनुमोदन होने के बाद ही अधिग्रहण की कार्रवाई शुरू होती है। रोडतो हाद नावाजल नही उन तयार र जिला प्रशासन व एनटीपीसी द्वारा पुनर्वास नीति के तहत समिति नहीं बनाने और बैठक आयोजित नहीं करने से यह स्पष्ट है कि हाईकोर्ट में पहले जो प्रकरण दर्ज हैउसे विवादों में रखने का प्रयास किया जा प्रभावित लोगों को पुनर्वास नीति के तहत रोजगार न उसे विवादों में रखने का प्रयास किया जा रहा है ताकि प्रभावित लोगों को पुनर्वास नीति के तहत रोजगार न देना पड़े। अगर ऐसा नहीं किया गया तो भू अर्जन अधिनियम 2013 के तहत लागू पुनर्वास नीति का पालन कर सभी प्रभावितों को रोजगार उपलब्ध कराना पड़ेगा। अब प्रभावित किसान हाईकोर्ट में चले भी जाएंगे तो सालों तक इसकी सुनवाई नहीं होगी और कंपनी किसानों की जमीन पर खड़ी हो जाएगी जिसे बाद में हटा पाना मुश्किल है। इसलिए जिला प्रशासन नियम विरुद्ध जमीन लेने पर तुला हुआ है। भूमि अधिग्रहण और अवार्ड होने के बाद 2569 लोगों को छग पुनर्वास नीति के तहत रोजगार के पात्र होने के लिए तात्कालीन कलेक्टर अमित कटारिया ने चिह्नांकित किया था। कंपनी व सीआईडीसी को पत्र लिख कर स्थायी रोजगार के हकदार होना बताया गया था।