गठबंधन पर सोनिया का फैसला ।
April 17, 2019 • Sudesh Jain

राहुल गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की पहली बैठक हुई थी। इस बैठक से दो दिन पहले ही लोकसभा में नरेन्द्रमोदी की सरकार के विरोध में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में राहुल गांधी ने दो काम करके मीडिया का विशेष रूप से ध्यान खींचा था। उन्होंने केन्द्र सरकार की उन्ही आलोचनाओं को उठाया, जिन्हें अब घिसापिटा माना जाता हैमसलन 15 लाख रूपये सभी के खातों में पहुंचाने का वादा, दो करोड़ युवाओं को प्रतिवर्ष रोजगार देना आदि। इसलिए राहुल गांधी के बयान पर किसी का ध्यान ज्यादा नहीं गया लेकिन जब उन्होंने अपनी बात खत्म करके प्रधानमंत्री की सीट के पास जाकर उनसे खड़े होने का अनुरोध किया और पीएम के खड़े न होने पर उनके गले लिपट गये। श्री मोदी ने भी शिष्टाचार निभाते हुए राहुल गांधी को फिर से बुलाया और उनसे हाथ मिलाकर पीठ भी थपथपाई जब एक बार फिर राहुल गांधी उनसे गले मिले। कांग्रेस के युवा नेता और मध्यप्रदेश में चुनाव प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राहुल गांधी के भाषण की शायद तारीफ नहीं की थी बल्कि राजनीतिक अभिनय को सराहा और इस सराहना के जवाब में भी राहुल ने आंख दबाकर मीडिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा था। यह बात इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण रही क्योंकि कांग्रेस वर्किंग कमेटी में भी इसकी चर्चा हुई। मुख्य रूप से श्रीमती सोनिया गांधी ने गठबंधन की राजनीति पर एक बार फिर मुहर लगायी है। यह गठबंधन 2004 के गठबंधन से अलग है जब यूपीए बनाया गया था।

आज से लगभग 14 साल पहले श्रीमती सोनिया गांधी ने पहली बार कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति से जोड़ा था। उन्होंने यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) के नाम से मोर्चा बनाया जिसका मुख्य घटक कांग्रेस थी और खुले तौर पर नेतृत्व भी कर रही थी। उसके साथ जुड़े थे तमिल नाडु के द्रमुक, पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस, बिहार में लालू यादव की पार्टी राजद और राम विलास पासवान की पार्टी लोजपा। कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस और कई अन्य छोटे-छोटे दलों ने यूपीए में शामिल होकर भाजपा को सत्ता से बाहर कर दियाथा। वामपंथी दलों ने यूपीए को बाहर से समर्थन दिया था। वामपंथियों ने बाद में इसे स्वीकार भी किया कि वे सरकार में शामिल रहते तो बेहतर था। सोमनाथ चटर्जी को लोकसभा में स्पीकर का दायित्व दिया गया था। समाज वादी पार्टी और बसपा ने तब कांग्रेस के भविष्य को ठीक से नहीं समझा था। सपा ने तीसरा मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ा जिसे विशेष सफलता नहीं मिली और सपा-बसपा के यूपीए के साथ न मिलने पर सोनिया गांधी नाराज भी थी। चुनाव नतीजे घोषित होने पर सपा और बसपा को भी अपनी गलती का अहसास हुआ था। दोनों दलों ने यूपीए सरकार के बिना मांगे और बिना कोई शर्त के समर्थन दिया था।

इसमें कोई दो राय नहीं कि आज के हालात 2004 से अलग हैं और सपा-बसपा ने उत्तर प्रदेश में एकता दिखाकर जिस तरह से भाजपा को तीन लोकसभा और एक विधान सभा के उपचुनाव में पटकनी दी है, उससे विपक्षी दलों में सपा-बसपा का महत्व बढ़ गया है। कांग्रेस ने इन सभी समीकरणों को देखते हुए ही सीडब्ल्यूसी की बैठक में गठबंधन के बारे में रणनीति का उल्लेख किया है। लोकसभा चुनाव में भाजपा नीत गठबंधन राजग को चुनौती देने के लिए कांग्रेस समान विचार धारा वाले दलों के साथ राज्यवार गठबंधन करेगी। कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने चुनाव पूर्व और चुनाव बाद गठबंधन के लिए राहुल गांधी को अधिकृत किया है और राहुल गांधी शीघ्र ही इनके लिए समिति बनाएंगे। सीडब्ल्यूसी की बैठक में विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व का मुद्दा भी उठा। दरअसल कई क्षेत्रीय पार्टियां 2019 में विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व का दावा कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में बसपा के कोआर्डिनेटरों ने साफ-साफ कहा कि इस बार देश की दलित नेता को प्रधानमंत्री बनाना है। समाज वादी पार्टी के लोग भी नेता जी (मुलायमसिंह यादव) का यह सपना पूरा करना चाहते हैं। कर्नाटक में अभी हाल ही कांग्रेस और जेडीएस की दोस्ती से सरकार बनी है। मुख्यमंत्री एचडी कुमार स्वामी की तरफ से बयान आया था कि एचडी देवगौड़ा जी दुबारा प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते? इसी प्रकार चन्द्रबाब नायडू और सश्री ममता बनर्जी भी अपने को पीएम कुर्सी का दावेदार मानती हैं।

कांग्रेस ने इस मददे पर खलासा करने की जरूरत समझी क्योंकि भाजपा की तरफ से यह सवाल अभी से उठाया जा रहा है. कि विपक्ष का चेहरा कौन होगा? कांग्रेस के युवा नेता और राजस्थान प्रमुख सचिन पायलट और शक्ति सिंह गोहिल समेत कई नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि गठबंधन का चेहरा कांग्रेस से होना चाहिए। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि हम कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे, जब हम सब से बड़ी पार्टी होंगे, तो गठबंधन का चेहरा भी कांग्रेस से होगा। राहलगांधी गठबंधन का नेतत्व करेंगे। यह बात सभी विपक्षी दल स्वीकार करेंगे, इस पर संदेह है। इसीलिए मुख्य विपक्षी नेता यही कह रहेहैं कि चुनाव के बाद तय किया जाएगा कि प्रधानमंत्री कौन होगा। कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक में तो यही तय किया गया कि राहुल गांधी को ही प्रधानमंत्री का उम्मीदवार मानकर गठबंधन किया जाएगा।

यहीं पर एक समस्या है कि विपक्षी महागठबंधन में कई चेहरे यदि प्रधानमंत्री के रूप में पेश किये जाएंगे तो जनता भी भ्रमित हो सकती है और चेहरा नहीं पेश किया जाता है तो भाजपा को सवाल करने का मौका मिलेगा। राहुल गांधी कहते हैं कि चुनावी गणित को विपक्षीदल ठीक से समझे, यह गणित कहती है कि अगर विपक्षी दल एक साथ मिलकर आगामी लोकसभा चुनाव लड़ेंगे तो जीत तय है। इसलिए राष्ट्रहित में जिन-जिन राज्य में जरूरत होगी, वहां कांग्रेस क्षेत्रीय दलों में साथ गठबंधन करेगी। यह फार्मूला कठिन है लेकिन भाजपा को पराजित करने के लिए जरूरी भी है। राहुलगांधी ने एक बात अपनी पार्टी को लेकर कही है जो बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने पार्टी नेताओं से कहा कि वे गैर जिम्मेदारी से बयानबाजी न करें। राहुल ने कहा कि वे ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने से नहीं हिचकिचाएगे। संभवतः उनका इशारा पूर्व में मणिशंकर अय्यर के बयानों की तरफ थामणिशंकर अय्यर ने 2014 में मोदी को चाय बेचने वाला बताया तो गुजरात के विधान सभा चुनाव के समय अपने आधे अधूरे हिन्दी ज्ञान की वजह से मोदी को नीच आदमी कह दिया। इसका चुनाव पर बहुत असर पड़ा था। अभी हाल में शशि थरूर ने हिन्दू पाकिस्तान वाला बयान देकर पार्टी के लिए मुश्किल पैदा कर दी और कांग्रेस को कहना पड़ा कि यह शशि थरूर का निजी बयान है। शशि थरूर इस तरह के कई बयान दे चुके हैं।

अच्छी बात यह है कि कांग्रेस गठबंधन और चुनाव पर गंभीरता से चिंतन कर रही है। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने सुझाव दिया है कि 12 राज्यों में कांग्रेस संगठन मजबूत है और वह 150 सीटे जीत सकती हैं। उन्होंने करीब 300 सीटों पर अकेले लड़ने और बाकी सीटों पर सहयोगी दलों के साथ समझौता करने की वकालत की है। कांग्रेस ने यह बात साफ-साफ कह दी हैकि विपक्षी दल साथ में आते हैं तो विपक्षी दलों की जीत तय है। इसका मतलब यह है कि अकेले कांग्रेस को ही इसके लिए कोई दोष न दे और क्षेत्रीय दल दबाव बनाने का प्रयास न करें। भाजपा अगर एक-एक करके सभी राज्यों को छीनलेती है और केन्द्र में भी दुबारा सरकार बनाती है तो इसके लिए क्षेत्रीय पार्टिया भी कसूरवार ठहराई जाएंगीउन्हें अपने-अपने राज्य बचाने है तो वे कांग्रेस को नेता मानें। यही संदेश कांग्रेस की सीडब्लूसी बैठक में दिया गया है।